नींबूवर्गीय फल (Citrus fruits)
(Malta) पाइन एप्पल (Pineapple):
फल मध्यम से बड़े आकार का और शक्ल में कम लम्बा और गोल । फल की लम्बाई 5.75 से 6.75 सें.मी. , रंग गहरा पीला । फल का औसत वजन 125 से 175 ग्राम । फल के छिलके की मोटाई 0. 3 से 0.4 सैं.मी.। फल अक्तूबर-नवम्बर के महीने में पकता है। रस की मात्रा 35-40 प्रतिशत, औसत खटास (एसिडिटी) 0.6 प्रतिशत, कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 9-10 प्रतिशत, बीज की संख्या 10-12 प्रति फल। फल उत्पादन 55-60 क्विंटल प्रति एकड़।
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| kinnow |
| mausambi |
जाफा (Jaffa):
फल का आकार लम्बा गोल, लम्बाई 6.37 सें.मी. और चौडाई 6.51 सैं मी पकने पर लाल नारंगी रंग का हो जाता है। औसत वजन 140-190 ग्राम, रस की मात्रा 30-35 प्रतिशत । कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 9 से 10 प्रतिशत । बीज की संख्या 5-10 तक। छिलके की मोटाई 0.40 सें.मी.। फल नवम्बर माह में पकता है। फल उत्पादन 50-55 क्विंटल प्रति एकड़।
ब्लड रैड (Blood Red):
फल मध्यम आकार का व ऊपर से पिचका हुआ। छिलके की मोटाई 0.5 सें.मी., पकने पर लाल रंग की फांकों के साथ अच्छी तरह जुड़ा हुआ। फल की लम्बाई 6.5-7.0 सें.मी. और चौडाई 7.0-7.5 सें.मी. | औसतन फल वजन 150-200 ग्राम, रस की मात्रा 30-40 प्रतिशत, कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 10-12 प्रतिशत, खटास 0.6 प्रात औसत संख्या 9-10 प्रति फल। फल 60-65 क्विंटल प्रति एकड़।
मौसमी (Mausambi):
फल छोटे से मध्यम आकार का जिसकी लम्बाई 6.07 सें.मी. आर चाड़ाई 625 सें मी होती है। फल चिकना जिसके ऊपर लम्बाई में धारियां आर तल पर होता है । फल पकने पर गहरे पीले रंग के हो जाते हैं
जिनमें रस की मात्रा 30-35 प्रतिशत होती है। छिलके की मोटाई 0.35 सें.मी., फल में खटास केवल 0.25 प्रतिशत और कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 10-12 प्रतिशत। यह किस्म नवम्बर माह में पकती है। फल 35-40 क्विंटल प्रति एकड़।
सन्तरा (Mandarin)
किन्नो (Kinnow):
फल मध्यम, गोल या चपटापन लिए हुए नारंगी रंग के, फल का वजन 125-175 ग्राम होता है। पकने पर छिलका पतला, नर्म, चमकदार, सख्त तथा चिपका हुआ। गूद्दा गहरा नारंगी, पीला, रस 40-45 प्रतिशत, सुगन्ध बहुत अच्छी, घुलनशील तत्व (मिठास) 9-12 प्रतिशत, खटास 0.75-1.2 प्रतिशत (सिट्रिक एसिड) होता है।
फल 15 जनवरी तक पकता है। उत्पादन 80-100 क्विंटल प्रति एकड़ है, जो छः वर्ष की उम्र के पश्चात् होते हैं।
ग्रेपफ्रूट (Grapefruit)
फल बड़े आकार का, चपटा गोल, लम्बाई और चाड़ा 10-11 सें.मी, छिलका हल्का पीले रंग का, फल का औसत वजन 500-600 ग्राम, रस 28-20 प्रतिशत, कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 7.7 प्रतिशत तथा खटास 1.2-1.4 प्रतिशत, विटामिन 40-45 मि.ग्रा. प्रति 100 मि. ली. रस में होता है। फल दिसम्बर-जनवरी में पकता है। का 50-55 क्विंटल प्रति एकड़ है।
डंकन (Duncan):
फल मध्यम से बड़े आकार के गोल, चपटे, हल्के, पीले रंग के जिनकी लम्बाई 9-10 सें.मी. और चौडाई 10-11 सैं.मी., औसत फल वजन 400-500 ग्राम, जिसके छिलके कीमोटाई 0.8-0.90 सें.मी. रस की मात्रा 30 प्रतिशत और घुलनशील तत्व (मिठारा) 9-11 प्रतिशत, खटास 13-14 प्रतिशत और विटामिन सी 45-50 मि.ग्रा./100 मि.ली. रस। उत्पादन 24-28 वाटल प्रति एकड़। नवम्बर-दिसम्बर माह में पकता है।
रूबी रेड (Ruly Rel);
फल मध्यम से लम्बे आकार के छिलका पकने पर पीला गुलाबी रंग का, कहीं कही पर गहरे गुलाबी धब्बे आ जाते हैं। औसत वजन 500-550 ग्राम प्रति फल । फल की लम्बाई 9-10 से भी, और चौड़ाई 10-11 से मी., छिलके की मोटाई 0.8-0.85 सें.मी. । रस 30 प्रतिशत जिसमे कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 10-11 प्रतिशत और खटास 1.2-1.4 प्रतिशत और विटामिन सी 50-55 मि.ग्रा. प्रति 100 मि.ली. रस में होता है। फसल 32-36 क्विंटल प्रति एकड़, जो नवाबर में पककर तैयार हो जाती है।
नींबू (Lemon)
बारागासी (Baramasi):
फल मध्यम गोल तथा थोडे चपटे आकार के जिनका औसत वजन 80 ग्राम प्रति फल होता है। छिलका पतला (0.24 सें.मी.), रस की मात्रा 45 प्रतिशत, कुल घुलनशील तत्व (मिठारा) 7 प्रतिशत व खटास 3.5 प्रतिशत होती है। फल पकने का समय जुलाई से अगस्त और फरवरी-मार्च होता है। फसल 55-60 कि.ग्रा. प्रति पौधा (जुलाई-अगस्त) आती है।
कागजी कलां (Kagri Kalan):
फल गोल, थोड़ा छोटा, 40-50 ग्राम, पकने पर रंग पीला, छिलका पतला, नर्म गूद्दा रस से भरा हुआ (36 प्रतिशत) खटास और कुल घुलनशील तत्व (मिठास) क्रमशः 6.5 और 7 प्रतिशत होती है। विटामिन सी 32 मि.ग्रा. प्रति 100 मि.ली. रस में। फराल 55 किलोग्राम प्रति पौधा आती है।
(Sweet lime)
किस्म लोकल (Local variety):
फल गोल, मध्यम आकार, छिलका बहुत चिकना, पतला और विभिन्न प्रकार की सुगन्ध आती है। इस फल की कोई विशेष किस्म नहीं है। नये पौधों को बनाते समय यह अवश्य ध्यान देना चाहिए कि उन्हीं पौधों से चश्मा लिया जाये जिन पर अधिक फल आते हो क्योंकि इस फसल में काफी भिन्नता पाई जाती है।
औसत फल का वजन 100-150 ग्राम, छिलका 0.2-0.3 सें.मी., रस की मात्रा 45-50 प्रतिशत, कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 7. 5 प्रतिशत, खटास 0.07 प्रतिशत और विटामिन-सी की मात्रा 50-60 मि.ग्रा. प्रति 100 मि.ली. रस में होता है। फसल 300-500 फल प्रति वृक्ष होती है।
अच्छे पौधे तैयार करना (Quality plant production)
फल व नर्सरी उत्पादकों को अच्छी किस्म के पौधे पैदा करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। नींबू वर्गीय फलों की पैदावार में कमी और सूखा रोग के कारण इस बात का महत्त्व और बढ़ गया है। अच्छे पौधे तैयार करने के लिए आंख वाली टहनी और मूलवृन्त का चुनाव करने के लिए विशेष ध्यान देना चाहिए।
कलग का चुनाव (Scion selection)
इस कार्य के लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में अवश्य रखना चाहिए।
(1) चश्मा बीमार एवं सूखा रोग ग्रस्त भाग से नहीं लेना चाहिए।
(2) चश्मा उन पौधों से लें जो अच्छे व अधिक फल देने में सक्षम हो।
हरियाणा के अधिकतर बागों में नत्रजन एवं जिंक तत्वों की कमी पाई गई है जिसको इन तत्वों को डालने से ही पूरा किया जा सकता है।
जिंक की कमी (Zinc deficiency):
पूरे बढ़े हुए पत्तों में पीलेपन को 'मोटल लीफ' कहते हैं। कोमल शाखाओं की सबसे ऊपर वाली पत्तियां छोटी हो जाती हैं। टहनियां सूखनी शुरू हो जाती हैं। फूल कम आते हैं। इन लक्षणों की कृषि विज्ञान केन्द्र के मृदा एवं उद्यान विशेषज्ञ से जांच करवा लें।
जिंक की कमी को पूरा करने के लिए 0.5 प्रतिशत (5 किलोग्राम जिंक सल्फेट 2.5 कि.ग्रा. बुझा हुआ चूना 1000 लीटर पानी में घोलकर) मई-जून और अगस्त-सितम्बर में पौधों पर छिड़काव करें। इसी प्रकार नाइट्रोजन (नत्रजन) की कमी को पूरा करने के लिए (1-2 प्रतिशत) यूरिया (1-2 कि.ग्रा. यूरिया 100 लीटर पानी में) का ऊपर लिखे समय पर छिड़काव करें।
मध्यन्तर फसल (Intercrops)
जब बागों में फल लग रहे हों तो मध्यन्तर फसल नहीं लेनी चाहिए। लेकिन जिन बगीचों में पौधे अभी छोटे हों और उसमें फल न लगे हों वहां पंक्तियों के बीच उड़द, लोबिया, मूंग, चना, मटर जैसी दाल वाली फसल बोई जा सकती हैं। छोटे पौधों को बढ़ाने के लिए उनके चारों तरफ काफी फासला रखना चाहिए। इन फसलों को जरूरत के अनुसार खाद की अतिरिक्त मात्रा देनी चाहिए।
फल गिरने की रोकथाम (Control of fruit drop)
तुड़ाई से पूर्व फलों को गिरने से रोकने के लिए पेड़ों पर 10 पी.पी.एम. (10 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी) 2, 4-डी, 0.5% जिंक सल्फेट व 20 पी.पी.एम. (20 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी) आरियोफिन्जिन का पहला छिड़काव जून-जुलाई में और दूसरा सितम्बर के दूसरे सप्ताह में करें।
इसके लिए 6 ग्राम 2, 4-डी, 3 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट, 12 ग्राम आरियोफिन्जिन और 1.5 कि.ग्रा. चूना को 550 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव करें। जब नींबू वर्गीय पौधों में कपास या सूरजमुखी खड़ी हो तो 2, 4-डी का छिड़काव न करें। इस परिस्थिति में 20 पी.पी.एम. (20 मि.ग्रा. प्रति लीटर) एन. ए. ए. दवाई का प्रयोग करें।
तोड़ाई के उपरान्त रख-रखाव व डिब्बाबन्दी (Post harvest management and packing)
फलों को तोड़ने के पश्चात साफ करके तथा वर्गीकरण के आधार पर फलों को डिब्बों में बन्द करना चाहिए । फलों को मण्डी की मांग के आधार पर विभिन्न आकार के 20-25 कि.ग्रा. क्षमता या 4 कि.ग्रा. क्षमता वाले प्लास्टिक या गत्ते के डिब्बों में पैक करना चाहिए। डिब्बे के अन्दर एक कागज की तह रखें या अलग-अलग फलों को कागज में लपेटें।
कीट व हानि के लक्षण (Symptoms of insect infestation)
1. नींबू का सिल्ला (Citrus sylla,Diaphorina citri):
यह नींबू जाति के सभी वृक्षों का एक प्रमुख कीट है। इस कीट के गोल,चपटे एवं नारंगी-पीले रंग के शिशु तथा भूरे रंग के प्रौढ़ नई टहनियों और पत्तों से रस चूसते हैं, जिससे ये धीरे-धीरे पीले पड़कर अन्त में सूख जाते हैं। सिल्ला के शिशु, प्रौढ़ की अपेक्षा अधिक हानिकारक होते हैं।
यह कीट साल भर सक्रिय रहता है। इसकी 8 से 10 पीढ़ियां होती है। मार्च-अप्रैल तथा वर्षा ऋतु के बाद यह सबसे अधिक हानि पहुंचाता है।
इसके प्रकोप से पैदावार एवं गुणों पर विपरीत असर होता है। इसके शिशु 10 से 35 दिन में विकसित होकर प्रौढ़ बन जाते हैं। माल्टा एवं मीठे नींबू पर इसका प्रकोप ज्यादा होता है।
2. नींबू का लीफ माईनर (Citrus leaf miner, Phyllocnistis citrella):
यह भी नींबू के पत्तों को नुकसान पहुंचाने वाला एक प्रमुख कीट है। हल्के पीले रंग की बिना पैर वाली इसकी सूण्डियां, मुलायम पत्तियों की दोनों सतहों पर चांदी की तरह चमकीली और टेढ़ी मेढ़ी सुरंगें बनाती हैं। प्रकोपित पत्तियां तथा टहनियां कुरूप होकर सूख जाती हैं।
प्रकोपित पत्तियों पर फफूंदी व कोढ़ जैसी बीमारियां हो जाती हैं। मौसमानुसार ये सूण्डियां 5-30 दिन तक सुरंगों के अन्दर रह कर पत्तियों को खाती हैं। इनका प्रकोप बसंत आर मई से अक्तूबर के महीनों में ज्यादा होता है।
साल भर में इस कीट की लगभग 12 पीढ़ियां होती हैं। इसका प्रकोप मुलायम व रसदार पत्तियों पर अधिक होता है तथा नर्सरी में इसके प्रकोप से पूरा पौधा ही नष्ट हो जाता है।
3. नींबू की सफेद मक्खी (White fly, Dialeurodes citri) तथा काली मक्खी (Black fly, Aleuro-canthus woglumi) :
सफेद मक्खी के शिशु चपटे तथा हल्के पीले रंग के होते हैं एवं इनके शरीर पर बाल होते हैं। प्रौढ़ मक्खी के शरीर व पंखों पर सफेद रंग का चूर्ण जमा होता है। काली मक्खी के शिशु कांटेदार, चपटे, अंडाकार तथा गहरे भूरे या काले रंग के तथा प्रौढ़ हल्के नीले रंग के होते हैं।
इन दोनों कीटों के शिशु व प्रौढ़ दोनों ही मुलायम पतियों से रस चूसते हैं जिससे ये पत्तियां पीली होकर मुड़ जाती हैं तथा अन्त में सूख कर गिर जाती हैं।
इन मक्खियों के शिशु 25 से 70 दिनों तक पत्तियों की निचली सतह पर चिपके रहकर विकसित होते हैं। प्रौढ़ ज्यादा दिन जीवित नहीं रहता। ये कीट पूरी गर्मी (मार्च से सितम्बर) सक्रिय रहते हैं एवं इनका प्रकोप मार्च से अप्रैल व अगस्त से सितम्बर में ज्यादा होता है। इन कीटों की दो पीढ़ियां होती हैं तथा ये शिशु की अवस्था में शीतनिष्क्रिय रहते हैं।
4. (Citrus butterfly, Papilio demoleus):
यह नींबू जाति के पौधों का विशिष्ट कीट है। इसकी छोटी सूण्डियां भूरे काले रंग की होती हैं जिन पर सफेद धब्बे होते हैं तथा ये चिड़ियों की बीट के समान दिखते हैं।
विकसित होने पर ये हरे रंग की हो जाती हैं तथा आसानी से दिखाई नहीं देती हैं। ये सूण्डियां मुलायम पत्तियों को किनारों से मध्य शिरा तक खाकर क्षति पहुंचाती हैं।
नर्सरी तथा छोटे पौधों व मुलायम नई पत्तियों पर इसका प्रकोप ज्यादा होता है। 14-30 दिनों में ये सूण्डियां पूर्ण विकसित हो जाती हैं। अप्रैल से नवम्बर तक इसकी 4-5 पीढ़ियां होती हैं। यह प्यूपा की अवस्था में शीत निष्क्रिय रहती हैं। माल्टा पर इसका प्रकोप ज्यादा होता है।
5. छाल खाने वाली सूण्डी (Bark eating caterpillar, Indardeia quadrinotata and I. tetraonis):
यह कीट प्राय: सभी फलदार, छायादार व अन्य पेड़ों को नुकसान पहुंचाता है। यह कीट प्रायः दिखाई नहीं देता परन्तु जहां पर टहनियां अलग होती हैं
वहां पर इसका मल व लकड़ी का बुरादा जाले के रूप में दिखाई देते हैं। दिन के समय यह कीट की सूंडी तने के अन्दर सुरंग बनाती हैं और रात को छेद से बाहर निकलकर जाले के नीचे रहकर छाल को खाती हैं एवं खुराक नली को खाकर नष्ट कर देती हैं ।
जिससे पौधों के दूसरे भागों में पोषक तत्व नहीं पहुंच पाते हैं। बहुत तेज हवा चलने पर, प्रकोपित टहनियां एवं तने टूट कर गिर जाते हैं। जिन बागों की देखभाल नहीं होती उनमें पुराने वृक्षों पर इसका आक्रमण अधिक होता है। एक वर्ष में इस कीट की एक ही पीढ़ी होती है जो जून-जुलाई से शुरू होती है।



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