लीची (Litchi)
लीची की खेती यमुनानगर, अम्बाला, पंचकूला व करनाल जिलों में अच्छी होती है। इन जिलों की जलवायु लीची के लिये उपयुक्त है। इसके लिये अच्छे निकास वाली उपजाऊ भूमि उपयुक्त रहती है।
किस्में (Varieties) देहरादून (Dehradun):
यह किस्म भरपूर फसल देती है। इसके फल बहुत ही आकर्षक रंग के व न फटने वाले होते हैं। इसके फल जून के दूसरे सप्ताह में पकते हैं। इसका गूदा मीठा, मध्यम रस वाला तथा मुलायम होता है। इसके रस में 17 प्रतिशत कुल घुलनशील तत्त्व (मिठास) एवं 0.4 प्रतिशत अम्ल, गूदे एवं गुठली का अनुपात 3.75:1 है।
कलकत्तिया (Calcuttia):
यह अधिक फल देने वाली किस्म है और इसके फल बहुत बढ़िया, बड़े आकर्षक होते हैं जो जून के अन्तिम सप्ताह में पकते हैं। इसका गूदा मीठा तथा मुलायम एवं मध्यम रस वाला और अच्छी सुगंध वाला होता है। इसके रस में 18 प्रतिशत कुल घुलनशील तत्त्व (मिठास) एवं लवण 0.48 प्रतिशत अम्ल हैं। गूदे एवं गुठली का अनुपात 4.73:1 है।
सीडलैस लेट (Seedless Late):
यह इसका विवरणात्मक नाम है। इसका फल बहुत सुन्दर व अच्छे स्वाद वाला होता है। वीज बहुत छोटे व फल मोटे गूदे वाले होते हैं। इसे लोग बहुत पसंद करते हैं, यद्यपि इस किस्म के फल बहुत कम लगते हैं। यह जून के दूसरे पखवाड़े में पकती है। इसके रस में 18.7 प्रतिशत कुल घुलनशीन तत्त्व (मिठास) तथा 0.53 प्रतिशत अम्ल होता है। गूदे एवं गुठली का अनुपात 2.8:1 है।
रोज सैंटिड (Rose Scented):
जून के दूसरे सप्ताह में पकती है। और इसे सप्ताह के अन्दर-अन्दर ही तोड़ा जा सकता है। इसके फल आकर्षक, गुलाबी रंग लिये अच्छी सुगंध वाले होते हैं।
Ber ki kheti
प्रवर्धन (Propagation):
लीची का प्रवर्धन गूटी द्वारा होता है। उचित मोटाई की शाख (45-60 सें.मी. लम्बी तथा 0.1-1.25 सें.मी. मोटी) लेकर इसके निचले भाग से लगभग 2.5 सैं.मी. लम्बाई में छिलका हटा देते हैं। फिर इसे नम मौस-ग्रास से ढककर और ऊपर से एल्काथीन का टुकड़ा लपेटकर, कसकर बांध देते हैं। लगभग चार सप्ताह में जड़ें पूर्ण रूप से निकल आती हैं।
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Litchi Fal |
फिर शाख को पेड़ से काटकर अलग कर लेते हैं और आंशिक छाया में गमले या नर्सरी में लगाकर रख देते हैं। यद्यपि गूटी फरवरी-मार्च तथा जुलाई-अक्तूबर में लगाई जा सकती है फिर भी मध्य-अक्तूबर का समय अति उत्तम है।
पौधे लगाने का समय (Time of planting)
लीची के पौधे या तो पतझड़ में या वर्षा ऋतु के अंत में लगाएं। पतझड़ में लगाये पौधों की अपेक्षा वर्षा ऋतु में पौधे लगाने से अधिक सफलता मिलती है। वर्षा ऋतु के दौरान मैदानी भागों का तापमान सामान्य हो जाता है और तापमान में काफी नमी आ जाती है। इसलिए लीची के पौधे सितम्बर-अक्तूबर में लगाना अधिक अच्छा रहता है।
पौधों को गर्मी तथा ठण्ड से बचाना (Protection of plants from heat and frost)
पौधे लगाने के 4-5 साल तक, इन्हें गर्मी तथा पाले से बचाना चाहिए। इसके लिए सरकंडे का प्रयोग करना चाहिए । जंतर (लैंचा) पौधों के चारों तरफ उगाने से गर्मी तथा ठण्ड से काफी बचाव होता है। इसके लिए जंतर का बीज थाले (बेसिन) में पौधे के चारों ओर फरवरी में बोना चाहिए। अप्रैल तक लीची के पौधों के लिए पूर्ण छाया हो जाती है।
सर्दियों में जंतर को ऊपर से बांध देते हैं जिससे पाले से पौधों का बचाव हो सके। जंतर के तनों की बीच की जगह को भूसे से ढक देते हैं। जंतर की जड़ों की 2-3 बार काट-छांट भी कर देनी चाहिए जिससे लीची के पेड़ों के साथ खाद व पानी के लिए मुकाबला कर सके।
गोबर की खाद सुपर फास्फेट तथा म्यूरेट ऑफ पोटाश दिसम्बर मास में देने चाहिएं। यूरिया दो बराबर भागों में देनी चाहिए। इसका एक भाग फरवरी के मध्य में, दूसरा भाग अप्रैल के मध्य में फल लगने के बाद देना चाहिए।
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सिंचाई (Irrigation)
जब तक पौधे छोटे रहें गर्मी में इनकी सिंचाई सप्ताह में दो बार करना आवश्यक होता है। पड़ा में जब फल की वद्धि हो रही हो, इनकी सिंचाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
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| fruits |
कीट व हानि के लक्षण (Symptoms of insect infestation)
1. पत्ता मरोड़ अष्टपदी (Leaf roller, Aceria litchi):
यह लीची का एक विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण कीट है। इसके प्रौढ़ हल्के भूरे रंग के सूक्ष्मदर्शी होते हैं। शिशु सफेद रंग के होते हैं। यह प्रायः तेजी से बढ़ने वाले व वृक्षों के पत्तों को हानि पहुंचाते हैं। इनका प्रकोप वृक्षों के निचले भाग से शुरू होकर ऊपर की ओर बढ़ता है। प्रौढ़ व शिशु दोनों पत्तों की निचली सतह से रस चूसते हैं जिससे पत्तों पर छोटे-सफेद धब्बे बन जाते हैं।
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ये धब्बे धीरे-धीरे आपस में जुड़कर गहरे भूरे रंग की तह बना देते हैं। प्रकोपित पत्ते मुड़ जाते हैं और अन्त में गिर जाते हैं। अप्रैल से जून के गर्म व शुष्क महीनों में इसका प्रकोप ज्यादा होता है। मानसून शुरू होने पर कम हो जाता है और फिर सितम्बर के महीने में शुरू हो जाता है। सर्दियों में प्रकोप बहुत कम रहता है।
2. पत्ता लपेट सूंडी (Leaf roller, Tortrix opicyrita):
लीची के साथ-साथ यह कीट जामुन, आडू और अमरूद के पत्तों को भी नुकसान पहुंचाता है। इस कीट की सूंडी हरे रंग की होती है जिसका धड़ व सिर काले रंग के होते हैं। सूंडी कोंपलों और कलियों को जोड़ देती है और अन्दर रहकर खाती है। विकसित सूंडी पत्तों को प्रायः चौड़ाई के बल लपेटकर अन्दर रहकर किनारों से खाती है।
भीषण प्रकोप होने पर नया फुटाव इस सूंडी द्वारा नष्ट हो जाता है और पैदावार काफी प्रभावित होती है। कभी-कभी सूंडी नये फलों को भी हानि पहुंचाती है। यह कीट अप्रैल से अक्तूबर तक सक्रिय रहता है और इसकी कई पीढ़ियां होती हैं।
3. छाल खाने वाली इंडियां (Barkeating caterpillars, Indarbela quadrinotata and I. tetraonis);
यह कीट प्रायः सभी फलदार, छायादार व अन्य पेड़ों को नुकसान पहुंचाता है। यह कीट प्रायः दिखाई नहीं देता परन्तु जहां पर टहनियां अलग होती हैं वहां पर इसका मल व लकड़ी का बुरादा जाले के रूप में दिखाई देते हैं। दिन के समय यह कीट की सूंडी तने के अन्दर सुरंग बनाती हैं और रात को छेद से बाहर निकलकर जाले के नीचे रहकर छाल को खाती हैं एवं खुराक नली को खाकर नष्ट कर देती हैं जिससे पौधों के दूसरे भागों में पोषक तत्त्व नहीं पहुंच पाते हैं।
बहुत तेज हवा चलने पर, प्रकोपित टहनियां एवं तने टूट कर गिर जाते हैं। जिन बागों की देखभाल नहीं होती उनमें पुराने वृक्षों पर इसका आक्रमण अधिक होता है। एक वर्ष में इस कीट की एक ही पीढ़ी होती है, जो जून-जुलाई से शुरू होती है।
नियन्त्रण एवं सावधानियां (Control and precautions)
1. समय-समय पर अष्टपदी से ग्रसित पत्तों व टहनियों को तोड़ते रहें और जलाकर नष्ट कर दें।
2. नया फुटाव आने पर अथवा प्रकोप शुरू होने पर 500 मि.ली. डाईमेथोएट (रोगोर) 30 ई.सी. को 500 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़कें।
3. फल पकने के समय से थोड़ा पहले 500 मि.ली. मैलाथियान (सायथियान) 50 ई.सी. को 500 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़कें। आवश्यकता पड़ने पर 10 दिन बाद छिड़काव दोहरायें।
नोट:
1. मैलाथियान दवाई के छिड़कने के एक सप्ताह तक फलों को न तोड़ें।
2.1250 मि.ली. क्लोरपाईरीफॉस (डरसबान) 20 ई.सी. या 500 मि.ली. मैलाथियान (सायथियान) 50 ई.सी. को 500 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़कें।
3. इस कीट के नियन्त्रण के लिए निम्नलिखित कार्यक्रम अपनाएं। कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग, जाले हटाने के बाद ही करें।
1. सितम्बर-अक्तूबर (SeptemberOctober): 10 मि.ली. मोनोक्रोटोफॉस (नुवाक्रान) 36 डब्ल्यू.एस.सी. को 10 लीटर पानी में मिलाकर, सुराखों के चारों ओर की छाल पर लगाएं।
2. फरवरी-मार्च (February-March): रूई के फोहों को दवाई के घोल में डुबोकर किसी धातु की तार की सहायता से कीड़ों के सुराख के अन्दर डाल दें एवं सुराख को गीली मिट्टी से ढक दें। घोल बनाने के लिए 10 मि.ली. फैनिट्रोथियान (फोलिथियान/ सुमिथियान) 50 ई.सी. को 10 लीटर पानी में मिला दें। 10% मिट्टी के तेल का इमल्शन (एक लीटर मिट्टी का तेल + 100 ग्राम साबुन + 9 लीटर पानी) भी लगा सकते हैं।
अथवा
कीड़े के प्रत्येक सुराख में निम्नलिखित दवाइयों । में से किसी एक का पानी में बनाया गया 5 मि.ली. घोल डाल दें। इसके लिए 2 मि.ली. डाईक्लोरवॉस (नुवान) 76 ई.सी. को 10 लीटर पानी में मिलाएं तथा इसके बाद सुराखों को मिट्टी से बन्द कर दें।
नोट:
1. आसपास के सभी वृक्षों के सुराखों में भी । इन दवाइयों का प्रयोग करें।
2. बाग को साफ-सुथरा रखें व निर्धारित संख्या से ज्यादा पेड़ न लगाएं।



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