आम (Mango)
फलों का राजा आम हरियाणा का एक महत्त्वपूर्ण फल है व इसकी खेती अम्बाला, कुरूक्षेत्र, करनाल, सोनीपत व जींद जिलों में अच्छी होती है। हरियाणा की जलवायु आम के लिए उपयुक्त है परन्तु ऐसी जगह जहां तेज आंधियां या पाला पड़ता हो वहां आम की खेती करना मुश्किल है।
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| Mango Krishi |
आम के लिए अच्छे निकास वाली उपजाऊ भूमि उपयुक्त रहती है अधिक नमक व क्षार की मात्रा वाली जमीन इसके लिए अच्छी नहीं होती।
किस्में (Varieties)
दशहरी (Daseheri):
आकार में छोटे से मध्यम, छिलका औसतन मोटा और चिकना; गूदा पीला, सख्त और रेशे से रहित; अच्छी मिठास वाला; गुठली पतली, काफी समय तक रखा जा सकता है।
लंगड़ा (Langra):
आकार में दर्मियाना; छिलका औसतन मोटा, चिकना और हरा; गूदा सख्त, रेशा रहित; नींबू जैसे पीले रंग का; मीठा; अच्छी सुगंध; मध्यम गुठली और जुलाई में पकने वाला।
मल्लिका (Mallika):
यह किस्म नीलम व दशहरी किस्मों की संकर है व हर साल फल देती है।
आम्रपाली (Amrapali):
यह किस्म दशहरी व नीलम किस्मों की संकर है व हर साल फल देती है। कद में काफी छोटी है।
बम्बई हरा (Bombay Green):
आकार में दर्मियाना, नीचे से चपटा; छिलका पतला, चिकना व हरा; रेशा रहित; गूदा कोमल, सुगंध वाला; गुठली औसत आकार की; जुलाई में पकने वाला।
समरवहिस्त चौसा (Samarbahisht Chausa):
आकार में दर्मियाना; छिलका औसतन मोटा, चिकना और पीला; गूदा सख्त, रेशा रहित, सुनहरे पीले रंग का; मीठा; सुगन्ध अच्छी; गुठली औसत आकार की; जुलाई के अन्त से लेकर अगस्त तक पकने वाला।
फजली (Fazli):
आकार बड़ा; छिलका औसतन मोटा व हरा; गूदा सख्त, रेशा रहित, सुगन्धित; गुठली बड़ी; अगस्त में पकने वाला।
सिपिया शाह पसन्द (Sipia Shah Pasand):
मध्यम-मौसम की किस्म है। फल मध्यम आकार का; छिलका पतला परन्तु कड़ा; हरे पीले रंग के फल: बहत मीठा, गूदा पीले रंग का; पतली गुठली; काफी रसीला । इस किस्म के फल काफी दिनों तक रखे जा सकते हैं।
सूक्ष्म सिंचाई एवं फर्टीगेशन के लिए परिशिष्ट-3 देखें (See Annexure III for drip irrigation and fertigation)
नोट:
1. फलित वर्ष में यूरिया की एक अतिरिक्त मात्रा जून में डालें।
2. गोबर की खाद व फास्फोरस दिसम्बर में व नत्रजन तथा पोटाश फरवरी में दें।
3. खाद को मुख्य तने से 1-2 मीटर दूर 20-30 सें.मी. गहराई पर डालें।
4. पोषक तत्वों का प्रयोग भूमि परीक्षण के आधार पर करें।
फल गिरना (Fruit drop)
1. फलों को गिरने से बचाने के लिए यूरिया के दो प्रतिशत घोल से पेड़ पर अप्रैल-मई के महीने में छिड़काव करें।
2. लंगड़ा और दशहरी किस्मों में यह समस्या फलों की तुड़ाई से पहले आती है। इसलिए 20 पी.पी.एम., 2,4-डी (2 ग्राम 2, 4-डी 100 लीटर पानी में) का छिड़काव अप्रैल के अन्तिम सप्ताह में या मई के प्रथम सप्ताह में करने से फल का गिरना रुक जाता है।
अमरूद की खेती कैसे करें
पौधे लगाने का समय (Time of planting)
जुलाई-सितम्बर तथा फरवरी-मार्च।
पौधे तैयार करना (Plant propagation)
आम के पौधे वीनीयर कलम द्वारा तैयार किये जाते हैं। इससे काफी सफलता मिली है तथा जहां पौधा (मूलवृन्त) लगा हुआ है वहां पर भी यह क्रिया की जा सकती है। इसके लिए (साईन) कलम का चुनाव सावधानी से करना चाहिए।
कलम की मोटाई मूलवृन्त के बराबर की होनी चाहिए तथा उस तने की हो जिसमें फूल न आया हो तथा 3-4 महीने का हो। कलम लेने से 7-10 दिन पहले उसमें से पत्तियां तोड़ देते हैं। इससे कलियां फूल जाएंगी तथा ग्राफ्टिंग में काफी सफलता मिलेगी। इसको तैयार करने का बढ़िया समय मार्च से सितम्बर का है।
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| Mango |
तोड़ाई उपरान्त रख-रखाव (Post harvest management)
फलों को पूरी पकी अवस्था में तोड़ना चाहिए अन्यथा उसमें पूरा स्वाद तथा सुगन्ध नहीं आएगी। पकने का अनुमान फलों को पानी की बाल्टी में भिगोकर किया जा सकता है। जो फल पूरी तरह डूब जाएं (आपेक्षिक घनत्व 1.5) वे ही पूरी तरह पके हुए हैं।
स्थानान्तरण करने के लिए फलों को अपरिपक्व अवस्था में तोड़ना चाहिए। आम को आम तोड़ने वाले यन्त्र या कैंची से तोड़ना चाहिए | तोड़ाई सुबह या देर शाम करनी चाहिए।
नींबूवर्गीय फल (Citrus fruits)
डिब्बाबन्दी और स्थानान्तरण (Packing and transportation)
तोड़े हुए फलों को उनकी किस्म, आकार और पकने की अवस्था के आधार पर अलग-अलग करना चाहिए। गले और पूरी तरह पके हुए फलों को नजदीक की मण्डी या संरक्षण के लिए प्रयोग करना चाहिए। अच्छे फलों को गत्ते या प्लास्टिक पेटी में अखबार लगाकर दूर की मण्डी में भेजना चाहिए।
कीट व हानि के लक्षण (Symptoms of insect infestation)
1. आम का तेला या फुदका (Mango hopper, Idioscopus clypealis & Amritodus atkinsoni):
यह आम का प्रमुख कीट है। इसके हरे-मटमैले भूरे, फुर्तीले पच्चड़ (बेज) की शक्ल के प्रौढ़ एवं पीले भूरे फुर्तीले शिशु बौर, कलियों, फूल की डंडियों एवं नई पत्तियों से रस चूसते हैं जिससे ये मुरझाकर सूख जाती हैं। अत्यधिक प्रकोप से सारे पेड़ क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।
इस कीट के शिशु समूहों में फलों व छोटे फलों के डंठलों से रस चूसते हैं और प्रौढ़ की अपेक्षा अधिक हानिकारक हैं। बड़ी संख्या में प्रौढ़ पत्तियों की निचली सतह पर रहकर हानि करते हैं। ये कीट पत्तियों पर एक मीठा रस भी छोड़ता है जिस पर काली फफूंदी आ जाती है और पत्तियां चिकनाहट भरी दिखती हैं।
साल में इसकी दो पीढ़ियां होती हैं। पहली बौर के समय (फरवरी-अप्रैल) तथा दूसरी गर्मी/ बरसात के मौसम में (जून से अगस्त)। पहली पीढ़ी से ज्यादा हानि पहुंचती है। दूसरी पीढ़ी के प्रौढ़ घने, नमी वाले, छायादार स्थान पर शीतनिष्क्रिय रहकर फरवरी में फिर सक्रिय हो जाते हैं।
इस कीट के शिशु 10 से 20 दिनों में विकसित होकर प्रौढ़ बन जाते हैं। घने वृक्षों व पानी के खड़े रहने की स्थिति में यह कीट अधिक संख्या में बढ़ता है।
2. आम का मिलीबग (Mango milibug, Drosicha mangiferae):
ये मिलीबग आम के अतिरिक्त अंजीर अमरूद, बेर, अनार, नींबू आदि फल वृक्षों को, विशेषकर जो आम के वृक्षों के पास लगे होते हैं, भी नुकसान पंहुचाता है। दिसम्बर-जनवरी में अधिक संख्या में मिलीबग के छोट-छोटे अखरोट की तरह भूरे शिशु जमीन के अन्दर अंडों से निकल कर वृक्षों पर चढ़ते हैं तथा पत्तियों की सतह पर जमा हो जाते हैं।
नये फुटाव आने पर, फरवरी में ये पतली डालियों पर जमा हो जाते हैं। विकसित शिशु और प्रौढ़ मादा, चपटे, मोटे एवं अंडाकार होते हैं तथा इनके शरीर के ऊपर सफेद रंग का मोम जैसा चूर्ण जमा होता है। ये दोनों जनवरी से अप्रैल तक बढ़ती हुई बालियों एवं बौर वाली टहनियों आदि पर गुच्छों की तरह जमा होकर रस चूसते हैं।
परिणामस्वरूप डालियां मुरझा जाती हैं तथा प्रकोपित फूल व फल झड़ जाते हैं व अत्यधिक प्रकोप होने पर वृक्षों पर फल नहीं लगते। ये कीट एक प्रकार का मीठा रस (मधुस्राव) भी छोड़ते हैं जिस पर काले रंग की फफूंदी पैदा हो जाती है।
वयस्क मादा अप्रैल-मई में पेड़ से नीचे उतर कर भुरभुरी जमीन में अण्डे देती है। यह कीट दिसम्बर से मई तक सक्रिय रहता है जिसमें इसकी एक पाढ़ी होती है। जून से नवम्बर तक यह कीट अण्डों की अवस्था में जमीन के अन्दर रहता है।
ऐसे बागों में जिनको देखभाल नहीं होती हो या कई तरह के फल वृक्ष होने से मिट्टी का उलटना-पलटना सम्भव नहीं हो इस कीट का प्रकोप अधिक होता है।
3. आम का तना छेदक (Stem borer, Batocera rufomaculata and B. rubus):
यद्यपि यह तना छेदक ज्यादा नहीं पाया जाता पर जहां और जब इसका प्रकोप होता है वहां आम, अंजीर व शहतूत आदि के वृक्षों को भी यह नष्ट कर देता है। इस कीट के प्रौढ़ 5-6 सें.मी. लन्डे एवं मजबूत होते हैं तथा इनकी टांगें एवं एंटीना काफी लम्बे होते हैं।
तना छेदक की सुंडियां 6 से 8 सें.मी. लम्बी, मजबूत व पीले सफेद रंग की होती हैं एवं इनके मुखांग बहुत मजबूत होते हैं। ये सुंडियां तनों व शाखाओं में छाल के नीचे लकड़ी में सुरंग बनाकर उसको अन्दर ही अन्दर खाती हैं। ये सण्डियां लकडी के रेशों को खाने के बजाय काटती ज्यादा हैं।
सुरंग के छेद से तेल जैसा चिपचिपा पदार्थ निकलता है। इस कीट से प्रकोपित तने एवं शाखाएं कमजोर हो जाते हैं जिससे पत्तियां गिर जाती हैं एवं तेज हवा में तने टूट जाते हैं। प्रौढ़ शाखाओं की छाल खाते हैं एवं कम हानिकारक है। इसकी मई से जुलाई तक एक पीढ़ी होती है।
इंडियां 5 से 6 महीनों तक खाकर मार्च-अप्रैल में शीत निष्क्रियता के बाद प्यूपा में परिवर्तित हो जाती हैं। पुराने, चोट लगे, गिरे हुए अथवा नष्ट हुए वृक्ष पर इस कीट का अधिक आक्रमण होता है।
4. आम का गोभ छेदक (Mango shoot borer, Chlumetia transversa and Eupethecia spp.):
यह आम के नवजात कलम किए पौधों का बहुत विनाशकारी कीट है। इसकी सुंडियां पीले-नारंगी रंग की होती। तथा उनके वक्ष गहरे मटमैले, भूरे रंग के होते हैं। प्रारम्भ में नवजात संडियां पत्तियों की मध्य-शिराओं में छेद बनाकर खाती हैं तथा बाद में मुलायम प्ररोहों (शूट्स) के बढ़ते हुए भागों में सुरंग बनाकर भीतर ही भीतर 8-10 दिनों तक खाती हैं।
इसके छोटे एवं गोल प्रवेश द्वार से मलमूत्र निकलता रहता है। क्षतिग्रस्त प्ररोह नीचे की ओर लटक कर सूख जाती हैं और पत्तियां गिर जाती हैं। अन्त में पूरी नई बढ़वार सूख जाती है। यह कीट जुलाई से अक्तूबर तक सक्रिय रहता है जिसमें इसकी 3-4 पीढ़ियां होती हैं।
नवम्बर से मार्च तक यह प्यूपा के रूप में शीत निष्क्रिय रहता है। पुराने वृक्षों को यह ज्यादा हानि नहीं पहुंचाता।
5. स्केल कीट (Scale insect, Aspidiotus destructor, Chloropulvinaria psidii and Coccus spp.):
किसी क्षेत्र अथवा बाग में कई तरह के नालीदार (फ्ल्यूटिड) कंटीले एवं नरम स्केल कीट आम के पेड़ पौधों को कभी-कभी अधिक हानि पहुंचाते हैं। ये कीट छोटे, गोल एवं पीले भूरे या हल्के भूरे रंग के होते हैं तथा सफेद मोम जैसे चूर्णी पदार्थ से ढके रहते हैं। अण्डों से तुरन्त बाद शिशु, मुलायम टहनियों और पत्तियों की निचली सतह पर चिपककर रस चूसते हैं।
क्षतिग्रस्त वृक्षों का विकास रुक जाता है। ये कीट मीठा रस (मधुस्राव) भी छोड़ते हैं जिससे काली चींटियां आकर्षित होती हैं और फफूंदी भी लग जाती है। फरवरी-मार्च से अक्तूबर-नवम्बर तक यह कीट सक्रिय रहता है तथा प्रौढ़ के रूप में शीत-निष्क्रिय होता है। आम की कलमी जातियां तथा नवजात पौधे इन कीटों से ज्यादा क्षतिग्रस्त होते हैं।



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