INDIAN HISTORY | भारतीय इतिहास

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INDIAN HISTORY | भारतीय इतिहास

 इतिहास का अर्थ व क्षेत्र

INDIAN HISTORY,
इतिहास

इतिहास एक रोचक व उपयोगी समाज-विज्ञान है यह हमें बर्तमान के अंतीत (Past of the Present) के बारे में बताता है। अर्थात् इससे हमें ज्ञान होता है कि हमारी आज की दुनिया का निर्माण किस त ह हुआ। 

शताब्दियों की दीर्घ यात्रा के उपरान्त वर्तमान विश्व अस्तित्व में आया है और जो आज वर्तमान है, वो कल अतीत बन जाएगा। आज हम इलेक्ट्रॉन एवं कम्प्यूटर के युग में प्रवेश कर चुके हैं। मानव इतिहास की इस वर्तमान मंजिल में विकास की गति में अभूतपूर्व तेजी आ गई है घटनाएँ अत्यन्त ही तीव्र गति से घट रही हैं। 

मानव-जीवन मशीनी जीवन बन रहा है । ऐसे में अकसर यह लगने लगता है कि अतीत के अध्ययन की हमें क्या आवश्यवता है। इससे यह अर्थ निकलता है कि अब अतीत के अनुभवों की हमें कोई जरूरत नहीं रही। हजारों वर्षों का मानव अनुभव एवं ज्ञान निर्थक हो गया है, लेकिन यह धारणा उचित नहीं है, 

क्योंकि बर्तमान का अतीत से सम्बन्ध पूर्णतः विच्छेद होना सम्भव नहीं है। यहाँ तक कि मानव समाज की बिल्कुल प्रारम्भिक अवस्था को भी हम भुला नहीं सकते। उल्लेखनीय है कि उस सुदूर धुंघभरी मंजिल की बहुत-सी आदतेते, रीति-रिवाज़ और सांस्कृतिक तौर-तरीके आज भी हमारे जीवन में किसी-न-किसी रूप

में मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, हमारे नृत्य-संगीत और त्योहारों का बहुत कुछ हिस्सा उसी सुदूर अतीत से प्रारम्भ हुआ है। स्पष्ट है कि मनुष्य का अस्तित्व उसके अतीत से अलग नहीं होता। बहुत -से लोग इतिहास को एक विषय के रूप में पढ़ने से तो कतराते हैं लेकिन लोक-परम्पराओं में प्रवाहमान ऐतिहारिश्क व्याख्याओं से काफी प्रभावित होते हैं। 

अतः जाने-अनजाने मानव अपने पूर्वजों के अनुभवों से अपनी क्षमताओं को समृद्ध करता रहता है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में अतीत के अनुभव, भाषा व बोलियों का संप्रेषण होता रहता है।‘ ई० एच० कार अनुभवों के ऐसे संप्रेषण को ‘सामाजिक ग्रगति की आधारशिन्’ बताते हैं। 

वे आगे लिखते हैं-“एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को प्राप्त क्षमताओं के संप्रेषण द्वारा प्रगति ही इतिहास है ।“ इस प्रकार ऐतिहासिक ज्ञान मानव-जीवन की अमूल्य निधि है ।

GK

   दूसरी ओर मानव, समाज अथवा राष्ट्र विशेष की आत्म-पहचान उसके इतिहास से होती है। इस संदर्भ में रेगमॉण्ड मार्टिन (Ragmond Martin) ने ठीक ही कहा है कि ऐतिहासिक व्याख्याओं के बिना हम पशु मात्र हैं । यहाँ तक कि स्वयं की पहचान से भी रहित। इन व्याख्याओं के साथ ही हम मानव हैं। 

अतः संक्षेप में कहा जा सकता है कि इतिहास अध्ययन का लक्ष्य अतीत का अवलोकन करके वर्तमान को प्रशिक्षित करना तथा सुखद भविष्य के लिए मार्गदर्शन कराना है । स्पष्ट है कि अतीत को भूलने वाले किसी व्यक्ति अथवा राष्ट्र का कोई भविष्य नहीं होता।


प्रस्तुत अध्याय में हम इतिहास व उससे जुड़ी कुषछ प्रमुख अवधारणाओं तथा इतिहास लेखन व प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोतों पर विचार करेंगे।


        I. इतिहास : अर्थ एवं परिभाषा

           [History : Meaning and Definition]


इतिहास को परिभाषित करके उसके अर्थ को रेखांकित करना कोई सरल कार्य नहीं है विद्वान् इस संदर्भ में प्रायः एकमत नहीं हैं। समय और विभिन्न सभ्यताओं की जरूरत के अनुरूप इतिहास लिखा जाता रहा है। इसलिए उसका अर्थ, परिभाषा 

1. इस तथ्य के साथ ई० एव० कार ने बड़े ही सुन्दर शब्दों में इतिहास की व्याख्या की है-“ताकिंक प्राणी के रूप में मनुष्य की विशेषता का सो है कि वह विगत पीढ़ियों के अनुभवों को एकत्र करके अपनी क्षमताओं को विकसित करता है। 

आधुनिक मनुष्य के पास 5000 बर्ष के उत्क की अपेक्षा न तो बड़ा मस्तिष्क है और न ही विचार करने की ढूड़ी नैसर्गिक क्षमता ही है। परन्तु आज उसकी विचार शक्ति कई गुणा आधक हो गई है क्योंकि उसने मध्यवर्ती पीट़ियों से शिक्षा ग्रहण की है और उनहें अपने अनुभव क्षेत्र में शामिल कर लिया है।“


2. “Without historical interpretations we are brutes without even a sense of our own identities. With them, we arc human


अवधारणा भी भिन्न-भिन्न रही हैं। यदि ‘इतिहास” का शाब्दिक अर्थ देखें तो यह तीन पृथक् शब्दों ‘इति -ह-आस’ से बना है। इनका अर्थ है ‘निश्चित रूप से ऐसा हुआ। अर्थात् अतीत के घटनाक्रम को पूर्ण विश्वास के साथ पुनः रचना करने की प्रक्रिया को इतिहास की श्रेणी में रखा जा सकता है। 

आधुनिक इतिहास लेखन व चिंतन का कुछ आधार प्राचीन यूनान में मिलता है। वहाँ वाद-विवाद के निर्णय करने वाले विद्वान को ‘हिस्तोरे’ कहा जाता था जैसा कि हम जानते हैं कि इतिहास को अंग्रेज़ी भाषा में ‘हिस्ट्री’ कहा जाता है। यह शब्द यूनानी भाषा के शब्द इस्तोरिया (Istoria) से बना है जिसका 

अर्थ खोज, अनुसंधान, अन्वेषण अथवा सूचना है। ‘हिस्ट्री’ शब्द का प्रयोग अतीत की घटनाओं के अन्वेषण व खोज के लिए सर्वप्रथम यूनानी विद्वान् हेरोडोट्स ने किया। इसलिए उन्हें इतिहास का नक माना जाता हैं


* परिभाषाएँ (Definitions)-परिभाषा से हमारा अभिप्राय विषय के मूल तत्त्व को स्पष्ट करना और उसे सरल और बोधगम्य बनाना है, लेकिन इतिहास की सर्वमान्य परिभाषा देना आसान नहीं है। इतिहासकारों ने अपने-अपने तरीके से इतिहास को परिभाषित किया है। उनमें से कुछ उल्लेखनीय हैं-


रेनियर के मतानुसार, “इतिहास सभ्य समाज में रहने वाले मनुष्य के कार्यों का उल्लेख है ।“

(“History is a record of activities performed by man living in civilized society.”-Renier) 

हुइजिंग के अनुसार, “इतिहास अतीत की घटनाओं का विवरण है।“

(“History is an account of the past events.”-Huizinga)

हेनरी पीरेन का मत है कि, “इतिहास समाज में रहने वाले मनुष्यों के कार्यों की उपलब्धियों की कहानी है ।“

(“History is the story of the achievements through deeds performed by the men living in s0ciety.”--Henery Piren)

कालिंगवुड के मतानुसार, “सम्पूर्ण इतिहास विचारधारा का इतिहास होता है।“

(“All history is the history of thought.”-Collingwood)

क्रोचे का कथन है कि, “सम्पूर्ण इतिहास समसन्मयिक इतिहास होता है।“

(“All history is contemporary history.”-Croce)

जी०आर० एल्टन के अनुसार, “इतिहासकार जिसे लिखता है, वही इतिहास है।“

(“History is which the historian writes.”-G.R. Elton)

   उक्त परिभाषाओं से प्रकट होता है कि इतिहास अतीत में मानवीय क्रियाकलापों, घटनाओं का सार्थक अध्ययन है कालिंग्बुड ने इतिहास में विचारों को अधिक महत्त्व दिया है। उनके अनुसार गानवीय कार्य-कलापों का मूल खरोत व प्रेरकशक्ति विचार होते हैं । 

इसलिए घटनाओं व कार्य-व्यवहार को समझने के लिए विचारों को समझना जरूरी है दूसरी ओोर क्रोचे (Croce) ने इतिहास के समसामयिक होने पर बल दिया है। इस वाक्यांश का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक इतिहासकार अतीत का अपनी दृष्टि से विवेचन करता है। 

उसकी दृष्टि समसामयिक यानी वर्तमान की परिस्थितियों से प्रभावित होती है। इसीलिए उसके द्वारा रचित इतिहास समसामयिक (Contemporary) होता है। इसी दिशा में एल्टन ने निष्कर्ष रूप में कहा है कि इतिहासकार वर्तमान का प्रतिनिधित्व करता है और उसके द्वारा लिखा इतिहास अपने युग के विचारों और प्रतिमानों से प्रभावित है। इस रूप में इतिहासकार की व्याख्या ही इतिहास है।

उल्लेखनीय है कि तथ्यों का चयन तथा व्याख्या की अन्तःप्रक्रिया का स्वरूप अतीत व दर्तमान दोनों से जुड़ा है। तथ्य अतीत का प्रतिनिधित्व करते हैं तो इतिहासकार वर्तमान का । 

इस दृष्टिकोण से ई०एच०कार० द्वारा अपनी पुस्तक ‘इतिहास क्या है’ (What Is History) में दिया निष्कर्ष उल्लेखनीय है। वे लिखते हैं-“इतिहास, इतिहासकार तथा उसके तथ्यों की क्रिवा-प्रतिक्रिया की एक अनवरत प्रक्रिया है, अतीत और वर्तमान के दीच एक अंतहीन संदाद है।

“ (“History is a continuous process of interaction Between historian and his facts, an unending dialogue between past and present.”-E.H.Carr)

यहाँ ‘अन्तहीन संवाद’ का अर्थ है कि इतिस लेखन भी एक निरन्तर प्रक्रिया है जो अतीत और वर्तमान के बीच सम्बन्धों को जोड़ती है।


                             II. इतिहास का क्षेत्र

                                     [Scope of History]

SSC

मानव समाज आदिकाल से निरन्तर बदल रहा है । अनेकों तरह की मानवीय गतिविधियाँ चलती रही हैं तथा आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक घटनाक्रम घटित होता रहा है। इस दीर्घ अवधि के दौरान इतिहास-्षेत्र का स्वरूप भी समय एवं युग के अनुरूप बदलता रहा है। 

इतिहास लेखन के जनक हेरोडोट्स के समय से आधुनिक इतिहासकार टॉयन्बी तक के इतिहास लेखन की विवेचना से इसके निरन्तर परिवर्तित स्वरूप का अनुमान हो सकता है। वस्तुतः इतिहासकार अपने युग का प्रतिनिधित करता है। 

वह अपने युग की सामाजिक आवश्यथक्ताओं के अनुरूप इतिहास लेखन करता है । प्रत्येक युग के अपने कुछ सामाजिक मूल्य होते हैं और उनसे जुड़ी हुई सामाजिक समस्याएँ व प्रश्न होते हैं। 

इतिहासकार का दायित्व होता है कि वह अपने युग की इन समस्याओं व प्रश्नों का समाधान, अतीतकालीन समाज के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करके प्रस्तुत करे वस्तुतः यहीं वह प्रक्रिया है जिसमें इतिहास-क्षेत्र का निर्धारण होता है। 

कहने का अभिग्राय यह है कि मानव समाज के कौन-से पक्ष इतिहास अध्ययन के दायरे में आएँगे, यह किसी युग की सामाजिक जरूरतों से तय हुआ है रेनियर का कहना है कि प्रत्येक युग में समाज इतिहासकारों से कुछ प्रश्न करता है और इतिहासकार नवीन साक्ष्यों के आलोक में अतीत से उनका उत्तर प्राप्त कर समाज के समक्ष प्रस्तुत करता है। 

प्राचीन ज्ञान अधवा मानवीय कार्यों को बर्तमान व भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित करने के उद्देश्य से इतिहास लेखन की शुरूआत हेरोडोट्स ने की। लेकिन उसने इतिहास को गुख्यतः एक कहानी के रूप में प्रस्तुत किया। आधुनिक युग एक वैज्ञानिक युग है। 

इस युग की सामाजिक जरूरतों ने इतिहास को एक ‘विज्ञान’ के रूप में प्रस्तुत किया। आज हम इतिहास को एक ‘विज्ञान’ (Science) के रूप में पढ़ते हैं। 

उल्लेखनीय है कि घर्म-प्रधान मध्यकालीन युग में ‘सेंट आगस्टाइन’ ने दिश्व को ‘सिटी ओफ गॉड ‘ पुकारते हुए इतिहास की धार्मिक व्याख्या प्रस्तुत की।


   इसी प्रकार भारतीय सभ्यत्ता कई मायनों में विश्व से अलग रही है। यह वर्ण व जाति पर आधारित कर्म-प्रधान सभ्यता थी। यहाँ के सामाजिक मूल्य व उनकी आवश्यकताएँ भिन्न प्रकार की यीं । धर्म व कर्म- प्रधान साहित्य का सृजन प्रादीन काल में अधिक हुआ। परम्पराओं व रीति-रिवाजों पर बल दिया गया ! 

इसलिए यहाँ स्मृतियाँ व धर्म ग्रन्थ (विधि ग्रन्थ) तो रचे गए परन्तु क्रमानुसार घटनाओं पर आधारित राजनीतिक इतिहास लेखन की परग्परा का अभाव रहा। मध्यकालीन व पूर्व मध्यकालीन भारत में महापुरुषों के जीवन चरित अथवा राजवंशों के इतिवृत्तांत (Chronicles) लिखने की परम्परा रही। 


आधुनिक काल में इतिहास लेखन अपने तीनों आयामों को धारण करता हुआ एक स्वतन्त्र विषय के रूप में विकसित हुआ है। अब यह साहित्य, राजनीति या दर्शन अथवा किसी अन्य विषय को संवृद्ध करने की दृष्टि से समाज का अध्ययन करना है। 

संस्कृति में ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, रीति-रिवाज़ और कोई भी क्षमता या रुचि, जो मानव ते समाज का एक सदस्य होने के नाते अर्जित की है, शामिल है।

3 स्पष्ट है कि अब इतिहासकार युद्ध एवं शान्ति अथवा राजवंशों के उत्थान -पतन की राजनीतिक घटनाओं का क्रमानुसार विवरण देने की अपेक्षा अधिक मानवतावादी दृष्टिकोण रखते हैं। महापुरुषों की अपेक्षा इतिहास लेखन में सामान्य आदमी को अधिक स्थान दिया जाने लगा । 

सामान्य आदमी को इतिहास का बर्ता स्वीकार किया गया। इस आधुनिक दृष्टि के अनुसार सामान्य लोगों की मेहनत से उत्पादन व वितरण की व्यवस्था चलती है तथा यही समाज-विकास का आधार होती है। यही लोग इतिहास के निर्माता हैं तथा अन्य लोग (राजा, महाराजा व महापुरुष) उनकी तुलना में गौण हैं।


क्रमबद्ध इतिहास लेखन जब वैज्ञानिक पद्धति से किया जाता है तो इतिहासकार के समक्ष तीन प्रश्न उठते हैं कि अमुक घटना क्या है, यह कैसे घटी और क्यों घटी? इन तीनों प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए इतिहासकार सर्वप्रथम उस घटना से सम्बन्धित सभी प्रत्यक्ष व परोक्ष तथ्यों का संकलन करता है और फिर उनकी व्याख्या करता है। 

तथ्यों का संकलन करने का उसका कार्य वैज्ञानिक (वस्तुनिष्ठ) लोता है, जबकि उनकी व्याख्या एवं विश्लेषण में तर्क के साध-साथ इतिहासकार की परिकल्पना काप करती है और लेखन विद्या साहित्यिक होती है। 

अर्थात् वैज्ञानिक, परिकल्पनात्मकता तथा साहित्यिक, तीन वो प्रमुख उपादान हैं जिनका उपयोग, टेवेलियन के मतानुसार, एक इतिहासकार इतिहास-लेखन में करता है। 

यहाँ एक विचारणीय प्रश्न यह उडता है कि इस विधा से बह क्या मानवीय कार्यों एवं उपलब्धियों का ही विश्तेषण करता है या फिर साथ में प्रकृति का भी अध्ययन करता है। 

प्रसिद्ध इतिहासकार कालिंगवुड का विचार है कि प्रकृति का अध्ययन इतिहास-क्षेत्र में शामिल नहीं होता। इसमें केवल मानवीय गतिविधियों का ही आंकलन होता है लेकिन बहुत-से इतिहासकार इस बातों से पूर्णतः सहमत नहीं हैं।  

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