अमरूद (Guava)
अमरूद की खेती कैसे करें
अमरूद एक पौष्टिक गुणों से भरपूर फल है। पौधा सूखा सहन करने की शक्ति रखता है और हर प्रकार की मिट्टी व जलवायु में अच्छी प्रकार से फलता-फूलता है।
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Guava |
किस्में (Varieties)
इलाहाबाद सफेदा (Allahabad Safeda):
लम्बा, सीधा बढ़ने वाला पेड़, फल गोल, रंग क्रीमी, छिलका नरम, गूदा सफेद और बीज बहुत कम। स्वाद बहुत अच्छा।
सरदार (L-49):
कद की छोटी, बढ़वार खूब, फल बड़े व गोल, लहरीदार, गूदा सफेद, सुगन्ध व स्वाद में अच्छी, फैलाव वाली छोटी किस्म होने के कारण तेज हवाओं से प्रभावित क्षेत्रों के लिये उपयुक्त है।
हिसार सफदा (Hisar Safeda):
यह संकर किस्म इलाहाबाद सफेदा व सीडलैस अमरूद के परपरागण द्वारा तैयार की गई है। इसके पेड़ सीधे व खूब बढ़वार वाले, फल गोल व चमकदार गूदा सफेद, बीज बहुत कम, मिठास अधिक व अच्छे स्वाद वाला।
हिसार सरखा (Hisar Surkha):
ये संकर किस्म एपल कलर अमरूद व बनारसी सुरखा के परपरागण द्वारा तैयार की गई है। इसके पेड़ लम्बे व दर्मियाने फैलाव वाले, फल गोल, छिलका हल्के पीले रंग का, गूदा गुलाबी व अधिक मिठास वाला।
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बनारसी सुरखा (Banarsi Surkha):
हरे चमकदार पत्तों वाले लम्बे पेड़, खूब फल देने वाली किस्म, साल में वर्षा व सर्दी के मौसमों की दो फसलें, फल मध्यम आकार के, रंग क्रीमी, गूदा गुलाबी-सा, बीजों से भरपूर | जल्दी पकने वाली किस्म है।
मिट्टी व जलवायु (Soil and climate) अमरूद मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों में अच्छी प्रकार से होता है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी बढ़वार खूब होती है। लेकिन फल अच्छे गुणों वाले नहीं आते। यह सभी प्रकार की मिट्टी में अच्छा होता है लेकिन इसके लिए दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है।
पौधे तैयार करना (Plant propagation)
बीज से तैयार किए गये पौधों में काफी भिन्नता पाई जाती है व फलों के आकार व गुण भी अलग-अलग होते हैं अर्थात ये जरूरी हो जाता है कि केवल प्योंदी पौधों को लगाकर ही बाग तैयार करें।
दसी पौध तैयार करने के लिए सरदार किस्म के बीज प्रयोग में लाएं। बीज को फल से निकालकर गूदा रहित करें, धोएं व सुखाएं। बीज को फल से निकालने के तुरन्त बाद बिजाई करें तो अच्छा रहता है। बिजाई जलाई-अगस्त या मार्च में जमीन की सतह से उठी हुई क्यारियों में करें। बिजाई के 6 महीने बाद पौध की दूसरी जगह रोपाई करें। इन पौधों पर पैच बडिंग/इनारचिंग जुलाई-अगस्त या फरवरी-मार्च माह में करें।
सक्ष्म सिंचाई एवं फर्टीगेशन के लिए परिशिष्ट-3 देखें (See Annexure IIIforder irrigation and fertigation)
(1) सारी रूडी खाद, आधी सुपर फास्फेट और सल्फेट ऑफ पोटाश फरवरी में दें की आधी जुलाई में दें। यूरियाः आधी फरवरी तथा आधी जुलाई-अगस्त में दें।
(2) खाद मुख्य तने से 2-3 फुट की दूरी पर डालें।
(3) खादों का प्रयोग मिट्टी की जांच के आधार पर करें।
सिंचाई (Irrigation) सिंचाई 10-15 दिन के अन्तराल पर करते रहें। फूल पड़ने व फल लगने के दौरान सप्ताह में एक बार सिंचाई अवश्य करें। वर्षा ऋतु की फसल न लेने के लिए सिंचाई फरवरी से मध्य-मई तक बन्द कर दें।
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बाग के बीच की फसल (Intercrops)
बाग लगाने के 3-4 साल तक अमरूद के पौधों के बीच में पपीता लगा सकते हैं या दालें जैसे लोबिया और चना आदि बोई जा सकती हैं।
फसल प्रबन्ध (Crop regulation)
अमरूद की साल में दो फसलें प्राप्त होती हैं- एक फसल जुलाई-अगस्त में दूसरी नवम्बर-जनवरा में। परन्तु वर्षा ऋतु (जुलाई-अगस्त) में फल अच्छे गुणों वाले नहीं होते। इसलिए शरद्कालान फसल ही लेनी चाहिए। वर्षाकालीन फसल को रोकने के लिए - सिंचाई फरवरी से मध्य-३ तक बंद रखें या बसन्त में आए फूलों को हाथ से तोड़ दें या नेफ्थलीन एसिटिक एसिड का छिड़काव फरवरी-मार्च में करें। इसके लिए 30 ग्राम नैफ्थलीन एसिटिक एसिड के पाऊडर 50 मि.ली. एल्कोहल या स्पिरिट में घोलकर 100 लीटर पानी में मिलाएं।
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अमरूद जल्दी खराब होने वाला फल है। क्लाइमैटरिक फल होने के नाते फल का अपार अवस्था में ही तोड़ना चाहिए। अमरूद पकी हुई अवस्था में वृक्ष पर नहीं छोड़े जा सकत इस अवस्था में इनका पक्षियों द्वारा नुकसान हो सकता है। तोडाई कैंची से थोड़ी सी शाखा वसे थोड़ी सी शाखा व । एक-दो पत्ते रखकर करनी चाहिए। तोड़ाई लगातार करते रहना चाहिए। अधिकतर खाने वालों द्वारा अध पके फल पसन्द किए जाते हैं।
डिब्बाबन्दी (Packing)
परी तरह पके हुए फलों को नजदीक की मण्डी में भेजना चाहिए क्योंकि इनकार नकसान हो सकता है। दूर की मण्डी के लिए फलों को लकड़ी के डिब्बो म पक दर-दराज की मण्डियों में भेजने के लिए अमरूद को अपरिपक्व अवस्था में, जब का हो, तोड़ना चाहिए। उस हालत में फल का अपेक्षिक घनत्व 1.05 होना चाहिए
भण्डारण (Storage)
गर्मियों में फलों को जल्दी बाजार में भेज देना चाहिए जबकि सर्दियों में हरी अवस्था में अपरिपक्व फल 2-3 दिन का स्थानान्तरण समय सहन कर सकते हैं।
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कीट व हानि के लक्षण (Symptoms of insect infestation)
फल मक्खिया (Fruit Fly, Bactrocera diversus, B. dorsalis & B. zonatus):
अमरूद के फलों पर जुलाई से सितम्बर के महीनों में इन मक्खियों का प्रकोप अधिक होता है। इसके प्रौढ़ घरेलू मक्खी के बराबर होते हैं और तेज उड़ते हैं। मादा मक्खी फलों में छेद करके छिलके के नीचे अण्डे देती है। इसकी सूण्डियां (मैगट्स) उबले हुए
चावल के समान होती हैं और फल के गूदे को खाती हैं। जिन फलों पर अण्डे दिए जाते हैं, उन पर बहुत छोटे छिद्र (जो प्रायः गहरे हरे रंग के होते हैं) देखने को मिलते हैं। छोटे-छोटे जीवाणु इन छिद्रों से फलों
में प्रवेश कर जाते हैं जिससे फल गलकर गिर जाते हैं। सूण्डियां 5 से 7 दिन में पूरी विकसित हो जाती हैं और बनने के लिए जमीन पर गिर जाती हैं। पर से मार्च तक यह कीट प्रौढ़ावस्था में शीतनिष्क्रिय रहता है।
कीट व हानि के लक्षण (Symptoms of insect infestation)
2. छाल खाने वाली सूण्डी (Bark eating caterpillar, Indarbela quadrinatata and I. tatraonis):
अमरूद के साथ-साथ यह कीट प्रायः सभी फलदार, छायादार व अन्य पेड़ों को नुकसान पहुंचाता है। यह कीट प्रायः दिखाई नहीं देता परन्तु जहां पर टहनियां अलग होती हैं वहाँ पर इसका मल व लकड़ी का बुरादा जाले के रूप में दिखाई देते हैं।
दिन के समय यह कीट की सूंडी तने के अन्दर सुरंग बनाती हैं और रात को छेद से बाहर निकलकर जाले के नीचे रहकर छाल को खाती हैं एवं खुराक नली को खाकर नष्ट कर देती हैं जिससे पौधों के दूसरे भागों में पोषक तत्व नहीं पहुंच पाते हैं। बहुत तेज हवा चलने पर, प्रकोपित टहनियां एवं तने टूट कर गिर जाते हैं। जिन बागों की देखभाल नहीं होती उनमें पुराने वृक्षों पर इसका आक्रमण अधिक होता है। एक वर्ष में इस कीट की एक ही पीढी होती है जो जून-जुलाई से शुरू होती है।
3. स्केल कीट और मिलीबग (Scale insect and milibug, Chloropulvinaria psidii, Ferissia virgata, Pseudo-coccus spp. and Coccus spp.):
किसी-किसी क्षेत्र अथवा बाग में कई तरह के नालीदार (फ्ल्यूटिड) कंटीले एवं नरम स्केल कीट अमरूद के पेड़ पौधों को कभी-कभी अधिक हानि पहुंचाते हैं। ये कीट छोटे, गोल एवं पीले भूरे या हल्के भूरे रंग के होते है तथा सफेद मोम जैसे चूर्णी पदार्थ से ढके रहते हैं। अण्डों से तुरन्त बाद शिश, मुलायम टहनियों आर पत्तियों की निचली सतह पर चिपककर रस चूसते हैं।
क्षतिग्रस्त वक्षों का विकास रुक जाता है। ये कीट मीठा रस (मधुस्राव) भी छोड़ते हैं जिससे काली चींटियां आकर्षित होती हैं और फफूंदी भी लग जाती है। फरवरी-मार्च से अक्तूबर-नवम्बर तक यह कीट सक्रिय रहता है। तथा प्रौढ़ के रूप में शीत-निष्क्रिय होता है। अमरूद की कलमी जातियां तथा नवजात पाच इन कीटों से ज्यादा क्षतिग्रस्त होते हैं।





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