बेर की किस्मों को, फलों के पकने के आधार पर, तीन भागों में विभाजित किया गया है:

(1) अगेती

(2) मध्यम

(3) पछेती

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अगेती किस्में (फरवरी में पकने वाली किस्में) (Early ripening cultivars) गोला (Gola):

फल चमकदार तथा गोल; फलों का वजन 14.6 ग्राम; कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 17.4 प्रतिशत; अम्ल; 0.46 प्रतिशत; विटामिन-सी 85.5 मि.ग्रा./100 ग्राम; उपज लगभग 85 किलोग्राम प्रति पेड़ तथा फल फरवरी के पहले सप्ताह में पकते हैं।

सेब (Seb):

फलों का औसत वजन 14 ग्राम; कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 20.7 प्रतिशत; अम्ल 0.44 प्रतिशत; विटामिन-सी 85.0 मि.ग्रा./100 ग्राम; औसत पैदावार 80 किलोग्राम प्रति पेड़।

सन्धूरा नारनौल (SandhuraNarnaul):

फल का आकार लम्बा नुकीला; रंग हरा-पीला, प्रति फल औसत भार 15.7 ग्राम; कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 16.8 प्रतिशत; अम्ल 0.98 प्रतिशत विटामिन-सी 87.5 मि.ग्रा./100 ग्राम; औसतन उपज 85 किलोग्राम प्रति पेड़।

मध्य में पकने वाली किस्में (Mid-season ripening cultivars)

(फरवरी के तीसरे सप्ताह से मार्च के तीसरे सप्ताह तक पकने वाली)

कैथली (Kaithali):

फल का औसत भार 17.8 ग्राम प्रतिफल; कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 17.6 | प्रतिशत; अम्ल 0.51 प्रतिशत; विटामिन-सी 98.3 मि.ग्रा. /100 ग्राम; पैदावार 125 किलोग्राम प्रति पेड़। बारानी इलाकों के लिए सही पाई गई है।

मुडिया मुरहरा (Mudia Murhara):

फल घंटी के आकार का तथा पकने पर रंग पीला; औसत भार 24 ग्राम; कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 18.5 प्रतिशत; अम्ल 0.29 प्रतिशत; विटामिन-सी 90.7 मि.ग्रा./100 ग्राम; औसत पैदावार 125 किलोग्राम प्रति पेड़।

बनारसी कड़ाका (Banarsi Karaka):

पेड़ लम्बे; फल लम्बा तथा नुकीला; पकने पर फल पीले तथा चमकदार; औसत भार 27.7 ग्राम; कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 16.9 प्रतिशत; अम्ल 0.13 प्रतिशत; विटामिन-सी 110 मि.ग्रा./ 100 ग्राम; उपज 125 किलोग्राम प्रति पेड़। 

सनौरी नं. 5 (Sanauri no. 5):

फल अंडाकार और सिरा नुकीला; फल का औसत भार 17.6 ग्राम; कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 18.1, अम्ल 0.26 प्रतिशत; विटामिन-सी 70 मि.ग्रा./ 100 ग्राम; पैदावार 100 किलोग्राम प्रति पेड़।

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छुआरा (Chhuara):

फल लम्बा तथा गहरा-हरा; फल का छिलका खुरदरा; फल का वजन 22.25 ग्राम; कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 18.5 प्रतिशत; अम्ल 0.26 प्रतिशत; विटामिन-सी 70 मि.ग्रा./100 ग्राम; उपज 100 किलोग्राम प्रति पेड़।

देर से पकने वाली किस्में (Late ripening cultivars)

(मार्च के दूसरे सप्ताह से अप्रैल तक पकने वाली)

उमरान (Umran):

फल बड़ा; औसत भार 35 ग्राम; छिलका मोटा कड़ा; कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 19.5 प्रतिशत; अम्ल 0.33 प्रतिशत; विटामिन-सी 80 मि.ग्रा./100 ग्राम; पैदावार 200 किलोग्राम प्रति पेड़।

इलायची (Illaichi):

फल गोल तथा छोटा; पकने पर भूरे रंग का; फल का वजन 6.48 ग्राम; कुल घुलनशील तत्व 20 प्रतिशत; अम्ल 0.23 प्रतिशत विटामिन-सी 124.6 मि.ग्रा./100 ग्राम; पैदावार 115 किलोग्राम प्रति पेड़।

काठाफल (Kathaphal):

फल सेब के आकार का; कच्चा फल हल्का-लाल, हरे रंग का तथा पकने पर भूरे रंग का, फल का वजन 18 ग्राम; कुल घुलनशील तत्व 16 प्रतिशत; अम्ल 0.76 प्रतिशत; विटामिन-सी 84.6 मि.ग्रा./100 ग्राम, पैदावार 120 किलोग्राम प्रति पैड़।

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प्रवर्धन (Propagation)

बेर के प्योंदी पौधे तैयार करने के लिए पहले बीज द्वारा देसी पौधे तैयार किये जाते हैं जिसके लिए अप्रैल में क्यारियों में बीज डालते हैं और जुलाई-अगस्त तक पौधे चश्मा चढ़ाने लायक हो जाते हैं। देसी पौधों पर टी (T) -बडिंग, छल्ला, चश्मा तथा पेबन्द चश्मा विधि प्रचलित है परन्तु सबसे अधिक कामयाब विधि 'T' बडिंग है।

पौधे लगाने का समय दूरी (Planting time and spacing)

बेर के प्यौंदी पौधों को लगाने का समय अगस्त-सितम्बर है तथा बिना गाछी वाले पौधों को 15 जनवरी से फरवरी के प्रथम सप्ताह तक लगाया जा सकता है। जहां पानी की सुविधा हो वहां पौधे से पौधे की दूरी 10x10 मीटर रखनी चाहिए। इन पौधों को लगाने से पहले प्रत्येक गड्ढे में 50-60 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद, 2 किलोग्राम सुपरफास्फेट तथा 30 ग्राम क्लोरपाईरिफॉस धूड़ा मिलाकर भरना चाहिए।

सिंचाई (Irrigation)

मूसला जड़धारी पौधा होने के कारण इसकी जड़ें काफी गहराई तक जाती हैं तथा पौधा स्थापित होने के बाद इसको कम पानी की जरूरत होती है परन्तु छोटे पौधों को 4-6 दिन के अन्तर पर - सींचना चाहिए। बेर के बड़े पौधों को या बागों में साल में चार सिंचाइयों की जरूरत होती है-पहली सिंचाई जून में कटाई के बाद, दूसरी सिंचाई नवम्बर के महीने में फल लग जाने के बाद तथा तीसरी चौथी सिंचाई जनवरी में। सितम्बर से नवम्बर तक फूल लगता है। इस दौरान सिंचाई नहीं करनी चाहिए।

कटाई-छंटाई (Training and pruning) 

बेर के पौधों को सीधे बढ़ने के लिए तथा ढांचे को सुडौल बनाने के लिए सहारे की जरूरत होती है जिसके लिए पौधे को बांस या किसी _लकड़ी के सहारे से बांध देना चाहिए पौधे के मुख्य तने से कई शाखाएं निकलती हैं परन्तु जमीन से 70 सें.मी. ऊँचाई तक कोई शाखा नहीं रखनी चाहिए और उनके ऊपर 3-4 शाखाएं रखनी चाहिएं।

बेर की कटाई-छंटाई भी आवश्यक है क्योंकि बेर के पौधों से निकली नई शाखाओं पर ही पत्तियों के कक्ष में फूल निकलते हैं और इन्हीं पर फल लगते हैं। अतः पिछले वर्ष की टहनियों को 15 मई से 30 जून के बीच में काटना चाहिए और काटते समय पिछले वर्ष की प्राथमिक शाखाओं से निकली छठी से आठवीं द्वितीयक शाखाओं के ऊपर से काटना चाहिए।

पुराने बागों का जीर्णोद्धार

बेर के पुराने बागों (उमरान कैथली) के जीर्णोद्धार के लिए, पेड़ों की मुख्य शाखा से निकलने वाली टहनियों को 2 मीटर के स्तर तक काटना चाहिए। फफूंद बीमारियों के संक्रमण से बचाने के लिए शाखाओं के कटे हिस्से पर गाय का गोबर या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का पेस्ट लगाएं। काटने के बाद बहुत-सी टहनियाँ निकलती हैं। अगले वर्ष इनमें से 4-5 स्वस्थ टहनियाँ अलग-अलग दिशाओं में रखकर बाकी को काट देना चाहिए।

बेर के बाग में अन्य फसलें (Intercropping in ber orchard)

बेर के पौधों को लगाने के 4-5 वर्ष तक, जब तक पौधे पूरी तरह बढ़ नहीं जाते, दो कतारों के बीच में दलहनी फसलें, जैसे मूंग, उड़द, लोबिया तथा पत्तों वाली सब्जियां लगाई जा सकती हैं।

तोड़ाई उपरान्त रख-रखाव (Post harvest management)

कला को तोड़ने से 10-15 दिन पहले कैप्टान या डाईथेन एम-45 (500 मि.ग्रा. प्रति लीटर) का काव करने से तोड़ने के उपरान्त फलों को 8 दिन तक सड़ने से बचाया जा सकता है।

ber ki kheti
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डिब्बाबन्दी (Packing)

बेर की डिब्बाबन्दी कोरुगेडिट कार्डबोर्ड के डिब्बे के नीचे अखबार का कागज लगाकर करनी चाहिए।

वर्गीकरण (Grading)

वर्गीकरण करने के उपरान्त ही फलों को बेचने से अधिक लाभ होता है। बड़े आकार के 35 ग्राम के फल लगभग दोगुनी कीमत पर बिकते हैं।

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कीट हानि के लक्षण (Symptoms of insect infestation)

1. बेर की मक्खी (Ber fruitfly, Carpomyia vesuviana) :

यह बेर को सबसे अधिक हानि पहुंचाने वाला कीट है। इसका आकार घरेलू मक्खी जैसा होता है परन्तु इसका रंग भूरा-पीला होता है। काले रंग के धब्बे वक्ष पर सलेटी भूरे रंग के धब्बे पंखों पर होते हैं। जब फल मटर के दाने जितना हो जाता है, तब मादा मक्खी फलों के छिलकों के नीचे अंडे देती है। प्रभावित फल टेढ़े-मेढ़े आकार के और काने हो जाते हैं, जल्दी पकते हैं और गिर जाते हैं।

 ऐसे फल खाने के योग्य नहीं रहते। पूर्णतया विकसित सुंडियां (जो उबले हुए चावल जैसी होती हैं) बाहर निकलने के लिये अपने द्वारा बनाए गए छेद से प्यूपा बनने के लिए जमीन पर गिर जाती हैं। यह कीट 7 से 24 दिन तक सूंडी की अवस्था में रहता है। इसकी नवम्बर से अप्रैल तक 3-4 पीढ़ियां होती हैं। अगेती पछेती फसल और अधिक मिठास वाले फलों में अधिक नुकसान होता है।

 प्रौढ़ दीर्घायु होते हैं और एक जीवन चक्र 15 से 40 दिन के अन्दर सितम्बर के महीने में और 35 से 80 दिन में जनवरी में दिए गए अंडों से पूरा होता है।

2. लाख बनाने वाला कीट (Lac insect, Kerria lacca):

बेर के अतिरिक्त यह कीट अंजीर, पिलखन और पीपल को भी हानि पहुंचाता है। लाल रंग के छोटे शिशु काफी संख्या में नरम टहनियों से रस चूसते हैं जिससे पैदावार गुणवत्ता में भारी कमी जाती है। इनका शरीर चिपचिपे पदार्थ से ढ़का होता है। शिशुओं के त्यागे मल पर फफूंदी लग जाती है। इस कीट का प्रकोप जून-जुलाई से बैसाखी तक होता है। पुरानी आक्रमित टहनियों से प्रकोप फैलने में मदद मिलती है। जिन बागों की भली प्रकार से देखभाल नहीं होती वहां इसका प्रकोप अधिक होता है।

3. पत्ते खाने वाली भूडियां (Leaf eating caterpillar, Holotrichia ssp, Adoretus spp., Anomala spp and Schizonycha spp):

 भंडी की विभिन्न जातियां जो बहुभक्षी हैं, बेर के अतिरिक्त अंगूर अमरूद आदि वृक्षों को भी नुकसान पहुंचाती हैं। इनका प्रकोप शुष्क अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में ज्यादा होता है। यद्यपि प्रौढ़ कीट वृक्षों के पत्तों को खाते हैं परन्तु इनकी सूडियां (ग्रब्स) अनेक फसलों की जड़ों को मानसून या इससे पहले की वर्षा के बाद हानि पहुंचाती हैं। प्रौढ़, तगड़े भूरे चमकीले होते हैं,

या सायकाल के समय जमीन से बाहर आते हैं। सांयकाल से सुबह तक खूब खाते हैं तथा दिन निकलने से पहले (बहुत सवेरे) ही जमीन  में छुप जाते हैं। पत्तों पर गोल सुराख करके नुकसान पहुंचाते हैं। अधिक प्रकोप की अवस्था में वृक्षों में पत्ते खत्म कर देते हैं इस तरह के वृक्षों पर फल नहीं लगते प्रौढ़ की आयु लगभग एक महीना होती है इन कीटों की साल में केवल एक ही पीढ़ी होती है।

 4. बालों वाली सूण्डी (Hairy caterpillar, Euproctis fraterna and Euproctis spp):

यह छिटपुट कीट है और इसकी सूण्डी गहरे-भूरे रंग की होती है जिसके शरीर पर लम्बे-लम्बे बाल होते हैं। अण्डे से निकलने के तुरन्त बाद बहुत सारी सूण्डियां इकट्ठी होकर पत्ते को निचली सतह से खाती हैं और उसे छलनी कर देती हैं। बड़ी होने पर यह सारे पेड़ पर फैल जाती हैं और बहुत अधिक मात्रा में पत्तियों को खाती हैं जिससे शाखाएं पत्ती रहित हो जाती हैं।

ये सूण्डियां फलों को भी खाकर नुकसान पहुंचाती हैं जिससे उपभोक्ता ऐसे फलों को पसन्द नहीं करते। यह कीट फल लगने के पूरे मौसम में सक्रिय रहता है।

5. दीमक (Termite, Microtermes obesi Odonto-termes obesus):

यह कीट फलदार, छाया वाले अन्य वृक्षों को भारी नुकसान पहुंचाता है। इसका ज्यादा नुकसान पौध में या नये लगाए हुए पौधों में (जो नई रेतीली जमीन में रोपे जाते हैं) होता है। शुष्क अर्द्धशुष्क जलवायु इसके लिए लाभकारी होती है। ये कीट सूर्य की रोशनी पसन्द नहीं करते। ये या तो जमीन में रहकर वृक्षों की जड़ों को खाकर तने को खोखला करते हुए ऊपर की ओर बढ़ते हैं अथवा पेड़ों की बाहरी सतह पर मिट्टी की सुरंग बनाकर इसके अन्दर रहकर छाल को खाते हैं।

इसके कमेरों द्वारा जड़ों, छाल या बीच की लकड़ी की क्षति होने से वृक्ष सूखकर मर जाते हैं। दीमक से प्रकोपित वृक्ष तेज आंधी से गिर जाते हैं। जीवित पौधों के साथ-साथ यह सूखी लकड़ी को भी नुकसान पहुंचाते हैं। सारा साल इनका प्रकोप बना रहता है लेकिन सर्दी बरसात के समय यह प्रकोप कम हो जाता है

6. छाल खाने वाली सूण्डियां (Bark eating caterpillar, Indarbela quadrinotata and ltetraonis):

यह कीट प्रायः सभी फलदार, छायादार अन्य पेड़ों को नुकसान पहुंचाता है। यह कीट प्रायः दिखाई नहीं देता परन्तु जहां पर टहनियां अलग होती हैं वहां पर इसका मल लकड़ का बुरादा जाले के रूप में दिखाई देते हैं। दिन के समय यह कीट की सूंडी तने के अन्दर सुरंग बनाती हैं और रात को छेद से बाहर निकलकर जाले के नीचे रहकर छाल को खाती हैं एवं खुराक नली को खाकर नष्ट कर देती हैं

जिससे पौधों के दूसरे भागों में पोषक तत्व नहीं पहुंच पाते हैं। बहुत तेज हवा चलने पर, प्रकोपित टहनियां एवं तने टूट कर गिर जाते हैं। जिन बागों की देखभाल नहीं होती उनमें पुराने वृक्षों पर इसका आक्रमण अधिक होता है। एक वर्ष में इस इस काट की एक ही पीढ़ी होती है जो जून-जुलाई से शुरू होती है।

रोग लक्षण (Symptoms of disease)

1. सफेद चूर्णी रोग (Powdery mildew): इस रोग से फल पर सफेद सा पाऊडर जम जाता है। फलों का आकार छोटा रह जाता है। फलों की सतह खुरदरी हो जाती है। पैदावार में भारी कमी हो जाती है।

2. काजली रोग (Sooty mold): इसमें पत्तियां पीली होकर जल्दी गिर जाती हैं। काले रंग का चूर्ण पत्तियों के निचले भाग पर देखा जा सकता है।

3. आल्टरनेरिया झुलसा रोग (Alternaria blight): जनवरी-फरवरी माह में पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बे बनते हैं और बाद में पत्तियां झुलस जाती हैं।

4. सरकोस्पोरा लीफ स्पॉट (Cercospora leaf spot): पत्तों के ऊपर छोटे-छोटे गोल आकार के धब्बे, जो भीतर से भूरे तथा किनारे पर गहरे-लाल रंग के होते हैं, बन जाते हैं। रोग के अधिक प्रकोप में पत्तियां सूख कर गिर जाती हैं।

5. कलैडोस्पोरियम लीफ स्पॉट (Cladosporium leaf spot): पत्तों पर हल्के-भूरे रंग के छोटे-छोटे अनिश्चित आकार के धब्बे बनते हैं। पत्तियों की निचली सतह पर गहरे-भूरे या काले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं।

6. रतुआ या लीफ रस्ट (Leaf rust): पत्तियों की निचली सतह पर नारंगी या भूरे रंग के छोटे-छोटे कील बनते हैं। रोग से प्रभावित पत्तों का रंग भूरा या गहरा-भूरा हो जाता है।

7. फल गलन (Fruitrot): फल के निचले वाले हिस्से में हल्के भूरे रंग के धब्बे बनते हैं। धब्बों के ऊपर छोटे-छोटे काले दाने के रूप में दिखाई देते हैं।