Amla ki kheti

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Amla ki kheti

 आंवला (Aonla)

 

आंवला की खेती शुष्क क्षेत्रों में आसानी से की जा सकती है। 
आंवला

                 आंवला


किस्में (Varieties)
 

बनारसी (Banarsi): 

फल बड़े आकार के, औसत आकार 50 सें.मी., औसतन एक वृक्ष से 200 कि.ग्रा. फल प्राप्त, फलों में विटामिन-सी की मात्रा 417 मि.ग्रा./100 ग्राम व कुल घुलनशील तत्व (मिठास) की मात्रा 13.2 प्रतिशत।। 

चकइया (Chakaiya): 

फल मध्यम आकार के, फल का रंग पकने पर हरा जैसा, अचार बनाने के लिए उपयुक्त, फल का औसतन आकार 34 सैं.मी., विटामिन-सी की मात्रा 523 मि.ग्रा./100 ग्राम व कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 10.9 प्रतिशत। 

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हाथीझूल (Francis): 

फल बड़े आकार के, हरे रंग के, थोड़े से बीच में दबे हुए, फलों पर 6 धारियां, फल मुरब्बा बनाने के लिए उपयुक्त। 

 कृष्णा (Krishna): 

फल मध्यम आकार के, 6-8 धारियों वाले, लाल रंग के छोटे-छोटे धब्ब, फल कम रेशे वाले व पारदर्शी। . 

अन्य किस्में (Other varieties) 

कंचन (NA 4): 

चकइया किस्म के चयन से विकसित, मध्यम अवधि (मध्य नवम्बर-मध्य दिसम्बर) में पकने वाली छोटे फल, प्रति शाखा अधिक मादा पुष्प, परिरक्षण हेतु उपयोग में जाती है।

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नीलम (NA 7): 

यह फ्रांसिस किस्म के चयन से विकसित है। मध्यम अवधि (मध्य नवम्बर-मध्य दिसम्बर) में पकने वाली, फल बड़े आकार के (40-45 ग्राम प्रति फल), रेशे सहित, फल नैकरोसिस रोगरोधी, मादा पुष्प प्रति शाखा काफी मात्रा में। 

बलवन्त (NA 10): 

बनारसी किस्म के चयन से विकसित, शीघ्र पकने वाली (मध्य अक्तूबर-मध्य नवम्बर) फल मध्यम आकार के, मादा पुष्प प्रति शाखा काफी मात्रा में होते हैं। . 

पेड़ लगाने का समय (Time of planting) 

अगस्त-सितम्बर, 15 जनवरी-15 फरवरी

कृषि क्रियाएं (Agricultural operations) 

 काफी हिफाजत के बावजूद भी पेड़ लगाने के बाद इसके पत्ते झड़ जाते हैं परन्तु पेड़ पर थोड़े | ही समय में फिर से फुटाव आ जाता है। वर्षा के मौसम में सिंचाई की जरूरत नहीं होती परन्तु लम्बे समय तक सूखा पड़े तो सिंचाई करनी चाहिए। गर्मियों में जब तक पौधे जड़ न पकड़ लें,  हर 7-10 दिन बाद सिंचाई करनी चाहिए।

पौधे को 15 कि.ग्रा. गोबर की खाद प्रति साल पौधे  की आयु के हिसाब से देनी चाहिए। 0.500 कि.ग्रा. यूरिया खाद और 2.5 कि.ग्रा. सुपर फास्फेटप्रति पेड़ के हिसाब से फरवरी माह व 0.500 कि.ग्रा. यूरिया खाद जुलाई माह में डालें। 

पौधे तैयार करना 

फरवरी के महीने में वैज ग्राफ्टिंग द्वारा आंवले के पौधे तैयार किये जा सकते हैं।

कीट व हानि के लक्षण (Symptoms of insect infestation) 

1. छाल खाने वाली सूण्डी (Barkeating caterpillar) Indarbela spp.): यह कीट प्रायः सभी फलदार, छायादार व अन्य पेड़ों को नुकसान पहुंचाता है। यह कीट प्रायः दिखाई नहीं देता परन्तु जहां पर टहनियां अलग होती हैं वहां पर इसका मल व लकड़ी का बुरादा जाले के रूप में दिखाई देते हैं। दिन के समय यह कीट की सूंडी तने के अन्दर सुरंग बनाती हैं 

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और रात को छेद से बाहर निकलकर जाले के नीचे रहकर छाल को खाती हैं एवं खुराक नली को खाकर नष्ट कर देती हैं जिससे पौधों के दूसरे भागों में पोषक तत्व नहीं पहुंच पाते हैं। बहुत तेज हवा चलने पर, प्रकोपित टहनियां एवं तने टूट कर गिर जाते हैं। जिन बागों की देखभाल नहीं होती उनमें पुराने वृक्षों पर इसका आक्रमण अधिक होता है। एक वर्ष में इस इस कीट की एक ही पीढ़ी होती है जो जून-जुलाई से शुरू होती है।

आंवला
Amla

2. दीमक (Termite) (Microtermes obesi Odontotermes obesus): यह कीट फलदार, छाया वाले व अन्य वृक्षों को भारी नुकसान पहुंचाता है। इसका ज्यादा नुकसान पौध में या नये लगाए हुए पौधों में (जो नई व रेतीली जमीन में रोपे जाते हैं) होता है।

 शुष्क व अर्द्धशुष्क जलवायु इसके लिए लाभकारी होती है। ये कीट सूर्य की रोशनी पसन्द नहीं करते। ये या तो जमीन में रहकर वृक्षों की जड़ों को खाकर तने को खोखला करते हुए ऊपर की ओर बढ़ते हैं अथवा पेड़ों की बाहरी सतह पर मिट्टी की सुरंग बनाकर इसके अन्दर रहकर छाल को खाते हैं।

 इसके कमेरों द्वारा जड़ों, छाल या बीच की लकड़ी की क्षति होने से वृक्ष सूखकर मर जाते हैं। दीमक से प्रकोपित वृक्ष तेज आंधी से गिर जाते हैं। जीवित पौधों के साथ-साथ यह सूखी लकड़ी को भी नुकसान पहुंचाते हैं। सारा साल इनका प्रकोप बना रहता है लेकिन सर्दी व बरसात के समय यह प्रकोप कम हो जाता है।

3. शाखा पर गांठ बनाने वाली सूण्डी, (Betousa tylophora): इस कीट की काली सूण्डियां आंवले के विकसित हो रहे प्ररोहों के ऊपरी छोर पर गांठ बनाकर वृक्षों को थोड़ा-बहुत नुकसान पहुंचाती हैं। ग्रसित शाखाएं भद्दी दिखती हैं तथा अगले साल गांठों के ऊपर से प्ररोह की फिर बढ़वार होती है। यह कीट ज्यादा हानिकारक नहीं है।

नियन्त्रण एवं सावधानियां

(Control and precautions) इस कीट के नियन्त्रण के लिए निम्नलिखित कार्यक्रम अपनाएं। कीटनाशक का प्रयोग, जाले हटाने के बाद ही करें। 

1. सितम्बर-अक्तूबर (SeptemberOctober): 10 मि.ली. मोनोक्रोटोफॉस (नुवाक्रान) 36 डब्ल्यू.एस.सी. को 10 लीटर पानी में मिलाकर, सुराखों के चारों ओर की छाल पर लगाएं।

2. फरवरी-मार्च (February-March): रूई ___ के फोहों को दवाई के घोल में डुबोकर किसी धातु की तार की सहायता से कीड़ों के सुराख के अन्दर डाल दें एवं सुराख को गीली मिट्टी से ढक दें।

 घोल बनाने के लिए 10 मि.ली. फैनिट्रोथियान (फोलिथियान/ सुमिथियान) 50 ई.सी. को 10 लीटर पानी में मिला दें। 10". मिट्टी के तेल का इमल्शन (एक लीटर मिट्टी का तेल + 100 ग्राम साबुन + 9 लीटर पानी) भी लगा सकते हैं।

अथवा 

कीड़े के प्रत्येक सुराख में निम्नलिखित दवाइयों में से किसी एक का पानी में बनाया गया 5 मि.ली. घोल डाल दें। इसके लिए 2 मि.ली. डाईक्लोरवॉस (नुवान) 76 ई.सी. को 10 लीटर __ पानी में मिलाएं तथा इसके बाद सुराखों को मिट्टी से बन्द कर दें। 

नोट: __ 

1. आसपास के सभी वृक्षों के सुराखों में भी इन दवाइयों का प्रयोग करें। 

2. बाग को साफ-सुथरा रखें व निर्धारित संख्या से ज्यादा पेड़ न लगाएं।

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1. यांत्रिक विधि (Mechanical method):

खेत को साफ-सुथरा रखें। कोई भी चीज, जैसे ढूंठ, गली सड़ी, सूखी लकड़ी इत्यादि न रहने दें, क्योंकि ये दीमक के प्रकोप को बढ़ावा देती हैं। 

2. वृक्षों के आसपास गहरी जुताई करें व पाना दें जिससे दीमक का प्रकोप कम हो जाया 

3. गोबर की हरी व कच्ची खाद प्रयोग में न लाएं क्योंकि ये दीमक को बढ़ावा देती है। 

4. जहां तक हो सके रानी दीमक को नष्ट करें।

रासायनिक विधि (Chemical method): 

पौधे लगाने से पहले गड्ढे में 50 मि.ली. क्लोरपाइरीफांस 20 ई.सी. 5 ली. पानी में मिलाकर प्रति पौधा डालें। दवाई का घोल डालने से पहले प्रत्येक गढ़े में 2-3 बाल्टी पानी डाल दें। नए पौधे लगाने के बाद तथा लगे हुए पौधों में 1 लीटर क्लोरपाइरीफॉस 20 ई.सी. प्रति एकड़ सिंचाई करते समय डालें।

उन शाखाओं को जिन पर उभरी हुई गांठें बन गई हैं, नियमित रूप से तोड़ कर नष्ट करें, ताकि उनके अन्दर काली सूण्डियां खत्म हो जाएं।

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